मकर संक्रांति पर भावनात्मक सम्मान: कृतज्ञता, गुरु–शिष्य परंपरा और संस्कारों का जीवंत उत्सव
धनबाद, 15 जनवरी 2026: मकर संक्रांति के पावन अवसर पर शिक्षा, संस्कार और कृतज्ञता की भावनाओं से ओतप्रोत एक आत्मीय सम्मान समारोह का आयोजन राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर, धनबाद के संस्थापक प्राचार्य डॉ. वासुदेव प्रसाद द्वारा किया गया। इस अवसर पर विद्यालय के प्रथम अभिभावक प्रतिनिधि तथा भारतीय रेलवे, भारत सरकार से सेवानिवृत्त मुख्य आरक्षण पर्यवेक्षक गोरखनाथ राय को उनके आवास पर शॉल एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया।
सम्मान के क्षणों में डॉ. वासुदेव प्रसाद भावुक हो उठे। उन्होंने स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर, धनबाद की स्थापना 20 जुलाई 1978, गुरु पूर्णिमा के पावन दिन मात्र सात विद्यार्थियों के साथ की गई थी। उन्होंने कहा कि यह संस्था केवल एक विद्यालय नहीं, बल्कि उन अभिभावकों, समिति सदस्यों, विद्यार्थियों, सहयोगी शिक्षकों, शुभचिंतकों और उनकी नई पीढ़ियों की तपस्या, त्याग और विश्वास की जीवंत यात्रा है।
गोरखनाथ राय ने भावुक शब्दों में कहा— “राजकमल सरस्वती विद्यामंदिर मेरे लिए केवल एक विद्यालय नहीं, बल्कि एक संस्कारशाला है। जिस समय यह संस्था आरंभ हुई, उस समय संसाधन सीमित थे, पर संकल्प असीम था। डॉ. वासुदेव प्रसाद ने शिक्षा को व्यवसाय नहीं, साधना बनाया।आज मेरे दोनों पुत्रों का इस विद्यालय से पढ़कर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है। यह सम्मान नहीं, बल्कि उन स्मृतियों का पुनर्जीवन है, जो जीवन भर ऊर्जा देती रहेंगी।”
डॉ. वासुदेव प्रसाद के सुपुत्र, जो वर्तमान में रांची विश्वविद्यालय के डोरंडा महाविद्यालय में बी.एड. विभाग में अंग्रेजी विषय के शिक्षक हैं तथा झारखंड सरकार के गवर्नमेंट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, रांची में प्रतिनियोजित हैं, ने कहा— “थोड़ी-सी फिक्र, थोड़ी-सी कदर और कभी-कभी खैर-खबर—इन छोटी-छोटी बातों का प्रभाव अत्यंत गहरा और दूरगामी होता है। “इसी भावभूमि पर यह सम्मान कार्यक्रम आयोजित किया गया।
उन्होंने आगे कहा कि आज के एआई—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में हमारे समाज की पुरानी विभूतियां आरआई—ऋषि इंटेलिजेंस के रूप में सदैव मार्गदर्शक हैं। उनके अनुभव, संस्कार और जीवन-दृष्टि ही शिक्षा और साहित्य के माध्यम से अखंड भारत की आत्मा को सशक्त बनाते हैं।
यह आयोजन मात्र एक सम्मान समारोह नहीं, बल्कि गुरु–शिष्य परंपरा, कृतज्ञता, पीढ़ियों की निरंतरता और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का भावपूर्ण उत्सव बनकर उपस्थित सभी के हृदय में अमिट छाप छोड़ गया।
